The Eastern Roots

क्या अपना अस्तित्व खो बैठा है बिहार का सिनेमा?

Is the cinema of Bihar losing its identity overtime?

बिहार के बाहर रहने वाले कई लोगों के लिए “बिहार की रीजनल फ़िल्में” या “सिनेमा ऑफ़ बिहार” जैसी बातें अक्सर अनसुनी, अपरिचित या महत्वहीन लगती हैं। यह एक आम भ्रांति है कि बिहार का कोई मजबूत फ़िल्म उद्योग है ही नहीं — जैसे इसकी फ़िल्में या तो अस्तित्वहीन हैं या फिर ध्यान देने लायक नहीं। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या बिहार की क्षेत्रीय फ़िल्में सच में संकट में हैं, और धीरे-धीरे गुम होती जा रही हैं?

आज के दौर में बिहार के हज़ारों युवा, जो देशभर में काम कर रहे हैं, अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं — अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान से। सोचिए, कितने लोग गर्व से खुद को “बिहारी” कह पाते हैं? दुखद सच्चाई यह है कि हमारी मातृभाषाएँ — भोजपुरी, मगही, मैथिली — पीढ़ियों से फिसलती जा रही हैं। परंपराएँ बस खास मौकों तक सिमटकर रह गई हैं, जैसे छठ, जब लोग मजबूरी में ही सही, अपनेपन की ओर लौटते हैं।

इसी तरह का दर्द बिहार के क्षेत्रीय सिनेमा में भी दिखता है। जहां कभी कहानियों में मिट्टी की खुशबू मिलती थी, वहां अब फूहड़ता, बेसिर-पैर की चमक-दमक और शोर-शराबा हावी हो चुका है। कई फिल्मकार जब बिहार को पर्दे पर लाते भी हैं, तो अपनी ही भाषा के बजाय हिंदी का सहारा लेते हैं।

सवाल कीजिए — कितनी भोजपुरी, मगही या मैथिली फ़िल्में हैं जिनकी देशभर में चर्चा होती है? शायद बहुत कम। अगर कोई एक-दो नाम बताए भी, तो वे ज़्यादातर ₹2,000 करोड़ की भोजपुरी इंडस्ट्री से होंगे, जो आजकल अपनी फूहड़ता और सनसनीखेज कंटेंट की वजह से ही सुर्खियों में रहती है। लेकिन क्या हमेशा से ऐसा ही था?

भारत ने 1947 के बाद सिनेमा में लंबा सफर तय किया। राजा हरिश्चंद्र (1913) जैसे मूक फ़िल्मों के दौर से लेकर आलम आरा (1931) के साथ ‘टॉकीज़’ की शुरुआत हुई, और 1950 के दशक में सत्यजीत रे, बिमल रॉय, चेतन आनंद जैसे दिग्गजों ने भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाई दी। तो सवाल यह उठता है — यह सिनेमाई लहर बिहार तक कब और कैसे पहुंची? और बिहार की कितनी फ़िल्में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकीं?

बिहार के सिनेमा की जड़ें

बिहार में सिनेमा की शुरुआत जितनी पुरानी है, उतनी ही कम लोग इसके बारे में जानते हैं। 1902 में जमशेदजी फ्रामजी मदन — भारतीय थिएटर और फ़िल्मों के अग्रदूत — ने बॉम्बे की एल्फ़िंस्टन थिएटर कंपनी खरीदी थी। इसका एक विस्तार पटना में भी था, जिसे बाद में एल्फ़िंस्टन सिनेमा बना दिया गया। यहाँ 1931 में पहली बार मूक फ़िल्म ‘पुनर्जन्म’ दिखाई गई।

1960 के दशक में बिहार के सिनेमा में नई रोशनी आई गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो के साथ — पहली भोजपुरी फ़िल्म। इसमें कुमकुम, नज़ीर हुसैन और आशीम कुमार ने अभिनय किया। फ़िल्म 1963 में पटना के वीणा सिनेमा में रिलीज़ हुई थी, और इसे रिलीज़ करवाने का आग्रह खुद भारत के पहले राष्ट्रपति और गर्वित बिहारी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था।

1980 के दशक तक भोजपुरी सिनेमा ने अपनी जगह बना ली थी। लेकिन मैथिली, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं की फ़िल्में अब भी हाशिए पर ही रहीं।

आज भोजपुरी इंडस्ट्री ₹2,000 करोड़ का व्यापार है, लेकिन इसकी ज्यादातर फ़िल्में गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। जब बंगाल, केरल जैसे राज्यों का क्षेत्रीय सिनेमा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत रहा है, बिहार की फ़िल्में बड़े-बड़े मंचों से गायब हैं।

फिर भी उम्मीद बाकी है

नई पीढ़ी के कुछ फिल्मकार इस अंधेरे में रोशनी बनकर उभरे हैं। ऐसे ही नाम हैं — नीतू चंद्रा और उनके भाई नितिन चंद्रा। अपनी कंपनी चंपारण टॉकीज़ के माध्यम से वे बिहार की संस्कृति, भाषा और कला को सिनेमा में सम्मान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं।

उनके बनाए देस्वा, मिथिला मखान जैसी फ़िल्में और कई शॉर्ट फ़िल्में यूट्यूब पर खूब देखी जाती हैं। उनकी हर साल की छठ सीरीज़ ने लाखों लोगों को अपनी परंपरा से फिर जोड़ने का काम किया है।

मगर संघर्ष अभी भी बड़ा है। बड़े OTT प्लेटफ़ॉर्म — Netflix, Hotstar, Amazon Prime — बिहार की कहानियों में निवेश करने से हिचकते हैं। नितिन चंद्रा ने बताया कि देव्सा जैसी फ़िल्में तो थिएटर तक नहीं पहुँच पाईं। कहीं न कहीं सिनेमा के बाज़ार को वही चीज़ चाहिए जिसमें शोर हो, सनसनी हो — कला नहीं।

इसी कारण मिथिला मखान को वे अपने खुद के OTT प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ करने की योजना बना रहे हैं — एक साहसी और ऐतिहासिक कदम।

युवा फिल्मकार अचल मिश्रा भी इस नए दौर के चमकते सितारे हैं। उनके कैमरे में बिहार की असलियत सांस लेती है। उनकी मैथिली फ़िल्म गामक घर 2019 के मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल में Golden Gateway Award के लिए नॉमिनेट हुई। उनकी फ़िल्मों का धीमापन, दृश्य-काव्य और अवलोकन दर्शकों को भीतर तक छू जाता है।

नई कहानी, नया बाज़ार, नई पहचान

इन फिल्मकारों की बातें सिर्फ फ़िल्मों की नहीं — पहचान की हैं। भाषा और संस्कृति की हैं। यह उस आत्मसम्मान की लड़ाई है जो बिहार ने दशकों से तल्ख़ी के साथ झेली है।

नितिन चंद्रा ने The Ranchi Review के साथ बातचीत में एक अहम बात कही थी:
“बाज़ार बदलना है, तो नया बाज़ार बनाना पड़ेगा.”

और यही हो रहा है — एक नया बाज़ार, नई भाषा, नई कहानी और बिहार की मिट्टी में छिपे गर्व को फिर से जाग्रत करने की कोशिश।

यह सफर आसान नहीं है, लेकिन जो लोग इसे आगे बढ़ा रहे हैं, वे सिर्फ फ़िल्में नहीं बना रहे — वे बिहार की आत्मा को फिर से आवाज़ दे रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *